Friday, August 1, 2014

Jay Shree Krishna

आँखों के भीतर नदी है, पलकें मूँदकर नहाती हैं आँखेंदुनिया से थककर ओठों के अंदर वृंदावन हैचुप हो कर जीते हैं ओंठस्मृति सुगंध तृषित होने पर ह्रदय-धरा में प्रणय-नियाग्रामेरे लिए झरता हुआ लेकिन तुम्हारे ही लिएनिर्झर को 'नियाग्रा' कहते हो और मैं तुम्हेंकल को विहान पुकारते हो और मैं तुम्हेंवचन को प्राण कहते हो और मैं तुम्हेंसुख को मेरे नाम से जानते हो और मैं तुम्हेंसुख को तुम मेरी हथेली मानते हो और मैं तुम्हें।

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